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 शीर्षक - अटल, अकाट्य जिनों का कानून है सारी व्यथाओं को एक साथ समेटे  सभी परिभाषाओं को एक ही में लपेटे  दूर करने अग्यानता का कष्टप्रद झंझट  भरने हर एक सरोवर, हर एक पनघट  प्रेरित करके हर क्षण का वह अटल, विराट अभियान  जीतना है हर रण, बिना चलाए तीर-कमान  वह है ऐसा अस्त्र जिससे सब कुछ है कटता  जिसके अनुसरण से हर पाप है मिटता आत्मा है सर्वस्व और उसको पाना है सबकुछ  बहुत मिलेगा हमें जब हम बनायेंगे उसे बहुतकुछ  हर व्यक्ति वास्तव में परमात्मा है  और उसका किसी से नही सामना है  यथार्थ असल में अथाह है, अनंत है जो मानता है इस बात को, उसका सुख तुरंत है दिलाने आत्मा को पुनः उसका परमत्व  लाने अपने अंदर एक विराट, विशाल समत्व बुलाकर विराट अहिंसा और तपश्चर्य  बनाने रूखे-सूखे जीवन को तत्पर  रेगिस्तान में जैसे मान्सून है अटल, अकाट्य जिनों का कानून है । *****
 शीर्षक-  तुम ब्राम्हण हो, तो ब्रम्ह हूँ मैं चाहते हो हर पल जिस मुकाम को करना प्राप्त  पर रह जाते अनेक कारणों से, ऐसी स्थिति होती है व्याप्त  जिस शुध्दता बनाम विशुद्धता को करते हो रेखांकित  जिस ऊर्जा से होते हो सशक्त और काफी हद तक आशान्वित  उस द्वैत के विरुद्धवाद का असरदार बम हूँ मैं  सारे कर्म, साधना और ग्यान को बाँधने वाला अभिधम्म हूँ मैं  तुम ब्राम्हण हो, तो ब्रह्म हूँ मैं।  *****
 शीर्षक  - मुझे स्वामी जिन से अगाध प्यार है सारे कष्टों को स्वयं में समेटने  सारी नकारात्मकता को एक साथ लपेटने  बनाकर सारे अवसादों का एक गठ्ठर  न मानना वह हर एक चीज जो है कट्टर  भीतर के द्वैत को है हराना जो है हिंसा से पोषित  नियंत्रित करना उस उमड़ते हुआ अहम को जो है सर्वस्व से रोशित ना विचलित होना जब काल बदले अपनी करवट  हटाने सारी व्यूहरचना और दूर करना सारा कूड़ा-कर्कट  यह मानना की आत्मा ही है वास्तविक बैठका  वहां बैठने से नही होगा कोई भी साईटिका  रम जाना है आत्मा के आंनद में सदा-सदा के लिए  न हो कोई भी उल्लंघन नैतिकता का सर्वदा के लिए  सोख लेना है सारा दर्द और क्रोध अपने इर्द-गिर्द  कि फिर नही होये कोई अनहोनी, न होए कोई सिर दर्द  हारना है कुछ ऐसे, की द्रवित हो जाये संपूर्ण सर्वस्व  जब हम ही हों हम, और प्रसाद में मिले हमे अद्भुत अमरत्व  अपने अस्तित्व को इस तरह अहिंसा से परिभाषित करना है  बस तपश्चर्य ही है अटल विथान इस बात को साबित करना है मुझे उनसे मिलने का बेकरारी से इंतजार है मुझे स्वामी महावीर ...
Confession Of Continual Change & Exploration: Like most of us can't live with the same food all the time, sometimes we have Pav Bhaji, sometimes South Indian or at times North Indian thali, and so on... In the same way, I can't stay fixed with or fixated to any single intellectual thought process all the time.... Thus I may think, create and share about Communism or Socialism at one time, about Jainism or Christianity at some other time and of BJP and Janta Dal at yet another point in time.. As nothing is 100 percent true and we keep wanting change, so this is my adaptation to the vagaries of the mind and the world around it... *****
The Real Laws Of Happy Existence The issue with Atheism is, it should not increase immorality... ----- Yes, yes. I am Omistic, Atheistic, not really religious, but intensely moral... --- All religions have said their stories, thinking & hoping that we will become more moral.. But, we poor people, have lived only the stories and not walked the morality... ---- Religion is nothing but a complete package of life and living, in order to make us intensely moral.... ----- Morality has to be strengthened, more & more... For this, we need to work harder & harder on these two principles:  *Love All, Serve All*                   &    *Help Ever, Hurt Never* ----- Believe me, life is about nothing else, it's just about the practice of morality... ---- I want to be intensely & intensely moral... And I don't want its reward in some distant paradise... I want it here and in this life itself... --- What? You will give me t...
 MAKES SENSE, I THINK *SOME SAY:*  In yesterday's India, being Anti-Hinduism was being Pro-Secular... *SOME OTHERS SAY:* In today's India, being Pro-Muslim is being Anti-National... *LET US CREATE A SYSTEM:*  Wherein being *Pro-Hindu*, or being *Pro-Muslim*, or being *Pro-National* should become *Absolutely Synonymous* and they all should mean *BEING PRO-PEOPLE....* *****
 ये चंद पल भी रास आयेंगे हम निकले हैं एक अंत से  हम समाप्त हो जायेंगे दूसरे अंत से  जो करना है कर लो इसी बीच  बस सद्भावना रखो, न मानो किसी को नीच  कुछ लोगों के लिए जिंदगी आसान है  कुछ लोगों के लिए यह बहुत कठिन काम है  मानो या ना मानो यह सब नसीब का खेल है  सबके लिए अलग मापदंड हैं फिर कोई पास और कोई फेल है  इस असमता को कैसे हराओगे  मार्क्सवाद से तो स्थिति और मुश्किल बनाओगे  स्वीकार कर लो इस अस्थाई जटिलता को  और क्या चारा है हमारे पास सुलझाने काअस्तित्व की कुटिलता को  कोशिश करो खुश रहने की क्योंकि शायद खुशी ज्यादा मधुर है  क्योंकि उसमे उग्रता कम है जिससे स्थिति जाती सुधर है  हर व्यक्ति अपने हिसाब से ही चलेगा, अपेक्षा मत रखो  जबर्दस्ती चीजों को करवाने की चेष्टा मत करो एक दिन आये हैं, एक दिन चले जाएंगे  अच्छा वातावरण रखेंगे तो ये चंद पल भी रास आयेंगे ।  *****