शीर्षक-  तुम ब्राम्हण हो, तो ब्रम्ह हूँ मैं


चाहते हो हर पल जिस मुकाम को करना प्राप्त 


पर रह जाते अनेक कारणों से, ऐसी स्थिति होती है व्याप्त 


जिस शुध्दता बनाम विशुद्धता को करते हो रेखांकित 


जिस ऊर्जा से होते हो सशक्त और काफी हद तक आशान्वित 


उस द्वैत के विरुद्धवाद का असरदार बम हूँ मैं 


सारे कर्म, साधना और ग्यान को बाँधने वाला अभिधम्म हूँ मैं 


तुम ब्राम्हण हो, तो ब्रह्म हूँ मैं। 


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