शीर्षक - मुझे स्वामी जिन से अगाध प्यार है
सारे कष्टों को स्वयं में समेटने
सारी नकारात्मकता को एक साथ लपेटने
बनाकर सारे अवसादों का एक गठ्ठर
न मानना वह हर एक चीज जो है कट्टर
भीतर के द्वैत को है हराना जो है हिंसा से पोषित
नियंत्रित करना उस उमड़ते हुआ अहम को जो है सर्वस्व से रोशित
ना विचलित होना जब काल बदले अपनी करवट
हटाने सारी व्यूहरचना और दूर करना सारा कूड़ा-कर्कट
यह मानना की आत्मा ही है वास्तविक बैठका
वहां बैठने से नही होगा कोई भी साईटिका
रम जाना है आत्मा के आंनद में सदा-सदा के लिए
न हो कोई भी उल्लंघन नैतिकता का सर्वदा के लिए
सोख लेना है सारा दर्द और क्रोध अपने इर्द-गिर्द
कि फिर नही होये कोई अनहोनी, न होए कोई सिर दर्द
हारना है कुछ ऐसे, की द्रवित हो जाये संपूर्ण सर्वस्व
जब हम ही हों हम, और प्रसाद में मिले हमे अद्भुत अमरत्व
अपने अस्तित्व को इस तरह अहिंसा से परिभाषित करना है
बस तपश्चर्य ही है अटल विथान इस बात को साबित करना है
मुझे उनसे मिलने का बेकरारी से इंतजार है
मुझे स्वामी महावीर जिन से अगाध प्यार है।
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