शीर्षक - अटल, अकाट्य जिनों का कानून है सारी व्यथाओं को एक साथ समेटे सभी परिभाषाओं को एक ही में लपेटे दूर करने अग्यानता का कष्टप्रद झंझट भरने हर एक सरोवर, हर एक पनघट प्रेरित करके हर क्षण का वह अटल, विराट अभियान जीतना है हर रण, बिना चलाए तीर-कमान वह है ऐसा अस्त्र जिससे सब कुछ है कटता जिसके अनुसरण से हर पाप है मिटता आत्मा है सर्वस्व और उसको पाना है सबकुछ बहुत मिलेगा हमें जब हम बनायेंगे उसे बहुतकुछ हर व्यक्ति वास्तव में परमात्मा है और उसका किसी से नही सामना है यथार्थ असल में अथाह है, अनंत है जो मानता है इस बात को, उसका सुख तुरंत है दिलाने आत्मा को पुनः उसका परमत्व लाने अपने अंदर एक विराट, विशाल समत्व बुलाकर विराट अहिंसा और तपश्चर्य बनाने रूखे-सूखे जीवन को तत्पर रेगिस्तान में जैसे मान्सून है अटल, अकाट्य जिनों का कानून है । *****
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Showing posts from February, 2023
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शीर्षक- तुम ब्राम्हण हो, तो ब्रम्ह हूँ मैं चाहते हो हर पल जिस मुकाम को करना प्राप्त पर रह जाते अनेक कारणों से, ऐसी स्थिति होती है व्याप्त जिस शुध्दता बनाम विशुद्धता को करते हो रेखांकित जिस ऊर्जा से होते हो सशक्त और काफी हद तक आशान्वित उस द्वैत के विरुद्धवाद का असरदार बम हूँ मैं सारे कर्म, साधना और ग्यान को बाँधने वाला अभिधम्म हूँ मैं तुम ब्राम्हण हो, तो ब्रह्म हूँ मैं। *****
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शीर्षक - मुझे स्वामी जिन से अगाध प्यार है सारे कष्टों को स्वयं में समेटने सारी नकारात्मकता को एक साथ लपेटने बनाकर सारे अवसादों का एक गठ्ठर न मानना वह हर एक चीज जो है कट्टर भीतर के द्वैत को है हराना जो है हिंसा से पोषित नियंत्रित करना उस उमड़ते हुआ अहम को जो है सर्वस्व से रोशित ना विचलित होना जब काल बदले अपनी करवट हटाने सारी व्यूहरचना और दूर करना सारा कूड़ा-कर्कट यह मानना की आत्मा ही है वास्तविक बैठका वहां बैठने से नही होगा कोई भी साईटिका रम जाना है आत्मा के आंनद में सदा-सदा के लिए न हो कोई भी उल्लंघन नैतिकता का सर्वदा के लिए सोख लेना है सारा दर्द और क्रोध अपने इर्द-गिर्द कि फिर नही होये कोई अनहोनी, न होए कोई सिर दर्द हारना है कुछ ऐसे, की द्रवित हो जाये संपूर्ण सर्वस्व जब हम ही हों हम, और प्रसाद में मिले हमे अद्भुत अमरत्व अपने अस्तित्व को इस तरह अहिंसा से परिभाषित करना है बस तपश्चर्य ही है अटल विथान इस बात को साबित करना है मुझे उनसे मिलने का बेकरारी से इंतजार है मुझे स्वामी महावीर ...
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Confession Of Continual Change & Exploration: Like most of us can't live with the same food all the time, sometimes we have Pav Bhaji, sometimes South Indian or at times North Indian thali, and so on... In the same way, I can't stay fixed with or fixated to any single intellectual thought process all the time.... Thus I may think, create and share about Communism or Socialism at one time, about Jainism or Christianity at some other time and of BJP and Janta Dal at yet another point in time.. As nothing is 100 percent true and we keep wanting change, so this is my adaptation to the vagaries of the mind and the world around it... *****
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The Real Laws Of Happy Existence The issue with Atheism is, it should not increase immorality... ----- Yes, yes. I am Omistic, Atheistic, not really religious, but intensely moral... --- All religions have said their stories, thinking & hoping that we will become more moral.. But, we poor people, have lived only the stories and not walked the morality... ---- Religion is nothing but a complete package of life and living, in order to make us intensely moral.... ----- Morality has to be strengthened, more & more... For this, we need to work harder & harder on these two principles: *Love All, Serve All* & *Help Ever, Hurt Never* ----- Believe me, life is about nothing else, it's just about the practice of morality... ---- I want to be intensely & intensely moral... And I don't want its reward in some distant paradise... I want it here and in this life itself... --- What? You will give me t...
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MAKES SENSE, I THINK *SOME SAY:* In yesterday's India, being Anti-Hinduism was being Pro-Secular... *SOME OTHERS SAY:* In today's India, being Pro-Muslim is being Anti-National... *LET US CREATE A SYSTEM:* Wherein being *Pro-Hindu*, or being *Pro-Muslim*, or being *Pro-National* should become *Absolutely Synonymous* and they all should mean *BEING PRO-PEOPLE....* *****
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ये चंद पल भी रास आयेंगे हम निकले हैं एक अंत से हम समाप्त हो जायेंगे दूसरे अंत से जो करना है कर लो इसी बीच बस सद्भावना रखो, न मानो किसी को नीच कुछ लोगों के लिए जिंदगी आसान है कुछ लोगों के लिए यह बहुत कठिन काम है मानो या ना मानो यह सब नसीब का खेल है सबके लिए अलग मापदंड हैं फिर कोई पास और कोई फेल है इस असमता को कैसे हराओगे मार्क्सवाद से तो स्थिति और मुश्किल बनाओगे स्वीकार कर लो इस अस्थाई जटिलता को और क्या चारा है हमारे पास सुलझाने काअस्तित्व की कुटिलता को कोशिश करो खुश रहने की क्योंकि शायद खुशी ज्यादा मधुर है क्योंकि उसमे उग्रता कम है जिससे स्थिति जाती सुधर है हर व्यक्ति अपने हिसाब से ही चलेगा, अपेक्षा मत रखो जबर्दस्ती चीजों को करवाने की चेष्टा मत करो एक दिन आये हैं, एक दिन चले जाएंगे अच्छा वातावरण रखेंगे तो ये चंद पल भी रास आयेंगे । *****
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शीर्षक - मैं हूँ तर्क देता पुरानी मान्यताओं को चुनौती हटाने सारी परंपराओं में धंसी हुई पनौती इंसान के लिए उठता हूँ ऊपर और अपार खड़ा हो जाता हूँ ईश्वर के विरुद्ध बन के मनुष्य का कर्णधार जानता हूँ विरोध में शांति नहीं है पर मुझे इसमे कोई भी भ्रांति नही है अगर व्यवस्था को मान लिया तो कैसे बढ़ाऊंगा सभ्यता को आगे तभी बढेगा मनुष्य जब वह समर्पण को है त्यागे कितने विह्वल हुए हैं, कितने हुए हैं विराट फ्राॅयड, डार्विन, मार्क्स, आईंस्टाईन और अन्य सम्राट जिन्होने नही माना है, एक लीक को, एक ढर्रे को जिन्होने उठा के दूर फेंका है अग्यानता के पर्दे को मैं तो लड़ूंगा, भिडूंगा बने-बनाये तरीकों के खिलाफ तभी हो पायेगा इंसान का वास्तविक विकास मनुष्य उपजा है बहुत कुछ कर जाने के लिए वह नही आया है, अन्य पशुओं की तरह समय में बह जाने के लिए करना है कुछ बड़ा, करना है बहुत कुछ हासिल लगे रहना है इस सोच में सतत, प्रयत्न भले हो फाजिल लोगों को जुझारू बनाना है चैन की नींद से उन्हे उठना सिख...
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शीर्षक- आइए एक ऐसा विश्व आंदोलन खड़ा करते हैं मोक्ष का है लक्ष्य कोई न ले इसे भक्ष पाना सभी को है यह मुकाम क्यों न संगठित होकर करें यह काम इस तथ्य को मानकर एक संगठन स्वीकार कर कि हम सब आत्माएं हैं हम सब परमानंद को चाहे हैं आत्मा स्व्यं ही परमात्मा है और नहीं कोई विश्वात्मा है अहिंसा को कुछ इस तरह बांधना है सभी को उस डोरी को फांदना है एक घेरे में लाकर एक बंधन बनाकर करना है विराट विकास जो उत्तेजित कर दे सारे श्वास समाज और अर्थव्यवस्था को सुधारकर एक सर्वसंपन्न जहां बनाकर विग्यान और तकनीकी को ऊपर चढाकर मनुष्य को शारीरिक अमरत्व दिलाकर जब सामाजिक-आर्थिक विषमताएं खत्म होंगी जब वैग्यानिक-तकनीकी क्षमताएं सर्वप्रथम होंगी तब बरसेगी अकूत नैतिकता जिसमे झिलमिलाएगी संपूर्ण मानवता तब ब्रम्हांड का एकाकार होगा उससे बढ़िया नही कोई आकार होगा तब सर्वस्व आतमापूर्ण हो जायेगा तब अस्तित्व संपूर्ण हो जायेगा हर व्यक्ति जो वास्तव में था, वही हो जाएग...
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शीर्षक - जब मिथ्याएं मिटायेंगी मिथक मिथ्या को छोड़ो मत संघर्ष को मरोड़ो मत मिथ्यों की बड़ी जरूरत है उनके बिना सबकुछ बदसूरत है मिथ्या चाहिए हमें मिथकों को मिटाने के लिए उनकी जरूरत है हमे दुनिया से बुराई हटाने के लिए क्या नहीं लिया था भगवान कृष्ण ने अधर्म का सहारा जब उन्हे जीतना था धर्म-युद्ध, बदलना था सारा नजारा हमे अगर बनाना है एक शांतिपूर्ण संसार जिसमे प्रबल और प्रशस्त हो अहिंसा का अभिसार तो हमें मिथ्या को जुटाना होगा एक और एक को ग्यारह बनाना होगा मनुष्य के मन और जीवन में बहुत क्लिष्टता है इस यथार्थ को बदलना है हमें, यह निश्चित सा है जब तक नहीं उमड़ता एक व्यापक आंदोलन जो निरस्त कर दे बुराई को और मिटा दे सारी अड़चन आइये जुटायें एक प्रबल और प्रशस्त ऊर्जा जिसका कोई सानी न हो, जिसके ऊपर न हो कोई दूजा अगर दुनिया की कड़वाहट को झुटलाना है अगर दुनिया को अच्छी तरह से बदल के जाना है तब हमें अनेक मिथ्याओं को अपनाना होगा उससे संसार की कड़वाहट को भगाना होगा मिथ्या एक ज...
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जैन धर्म और नव-जैन धर्म का सार 1) जैन धर्म एक अनुपम धर्म है जो अटूट तपश्चर्य और सर्वाधिक अहिंसा को अमल में लाकर व्यक्ति को मनुष्य से ईश्वर बना देता है। 2) जैन धर्म ही एक ऐसा धर्म है जो कभी भी, किसी भी स्थिति में अहिंसा से समझौता नहीं करता। 3) जैन धर्म बहुत ही प्रगाढ और गहन है। वह अहिंसा और तपश्चर्य के पालन मे बहुत अधिक कार्यशील है। 4) किसी रचियता ईश्वर को न मानकर और आत्मा को ही परमात्मा मानकर जैन धर्म एक साधक को पूर्णतः सशक्त कर देता है। 5) जैन धर्म शाकाहार को पूर्णतः अनिवार्य करके एक नयी, विराट और भव्य जीवन शैली प्रस्तुत करता है। 6) जैन धर्म की तीन अद्वितीय विशेषताएं है: हर मनुष्य वस्तुतः परमात्मा है और कोई परमात्मा नही है; अटूट अहिंसा के पालन से मनुष्य के नये कर्म बनने बंद हो जाते है; घोर तपश्चर्य से मनुष्य के पुराने कर्म कट जाते हैं। 7) जैन धर्म न तो आत्मा के सिवाय किसी और ईश्वर को मानता है और न ही इन बातों को कि सृष्टि को ईश्वर ने रचा है और एक दिन यह सारी दुनिया प्रलय में नष्ट है जायेगी। जैन धर्म के अनुसार ब्रम्हांड शाश्वत है। वह हमेशा था और...
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शीर्षक- जब धरा बनेगी स्वर्ग सारे जीवों का कल्याण जब बन जायेगा सबका निर्वाण जब समाज से सारा अभाव हट जायेगा जब संसाधनों की कमी का मुद्दा मिट जाएगा जब विग्यान और तकनीकी अपने चरम पर होंगी जब जीवन अनंत और स्वयं मृत्यु अपने क्रिया करम पर होगी जब नैतिकता में मनुष्य इतना ऊपर चढ़ जाएगा जब ईसा, बुद्ध, कृष्ण, महावीर से हर मनुष्य आगे बढ़ जाएगा जब पृथ्वी का राज संपूर्ण ब्रम्हांड पर होगा जब हर मानव का जीवन पूर्णतः सुंदर कांड सा होगा जब प्रेम की हिम गिरेगी दुनिया-भर में जब हर सीता चुनेगी अपने राम स्वयंवर में जब शीतल रहेगा हमेशा सभी का तन, मन, धन जब चलेगी सदा ठंडी हवा, खुशियों महकेंगी हर आंगन जब विग्यान और प्रग्यान का होगा अनोखा संगम जब बड़ी चीजें लायेंगी छोटे परिवर्तन जब छोटी बातों से मिलेगा बहुत बड़ा समर्थन जब लोगों की व्यवस्था पूर्णतः बदल जाएगी जब सारे शिकवे, शिकायतें सुलझ जायेंगी एसा स्वर्णिम युग आना ही है, आ के रहेगा हर मनुष्य इस स्थिति को चाहता है, और पा के रहेगा बस चलते रहो सतत अच्छाई की ओ...
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शीर्षक- मैं दिगंबर हूँ 1) भले नही त्यागे हो मैने कपड़े-लत्ते खेलता नहीं कभी भी मैं बनावटी पत्ते स्वार्थ से मुक्त एक स्वच्छंद अंबर हूँ मैं दिगंबर हूँ। 2) करता हूँ अहिंसा को प्रशस्त बनाना है जीवन को उच्चस्त कोई अपेक्षा नहीं, मस्त कलंदर हूँ मैं दिगंबर हूँ। 3) सदाचार कभी हारता नही उसका मृत्यु से कोई वास्ता नही देवों में राजा इंद्र हूँ मैं दिगंबर हूँ। 4) जिनों का पैगाम है एक नहीं चौबीस का आह्वान है सैंकड़ों गुरुओं का स्वयंवर हूँ मैं दिगंबर हूँ। 5) महावीर स्वामी का कायदा है इसमें बहुत ज्यादा फायदा है पालन में इसके निमग्न अगर हूं मैं दिगंबर हूँ। 6) तपश्चर्य का ऐलान है आदिनाथ से आया हुआ फरमान है मनुष्य नहीं कदाचित बंदर हूँ मैं दिगंबर हूँ। 7) आत्मा में इत्मीनान है उससे बड़ा नही कोई ईमान है शांति में भी अंधड़ हूँ मैं दिगंबर हूँ। 8) कटिबद्ध हूँ आनंद के लिए अपने लिए ही नही सर्वस्व के लिए जलाशय हूँ , समुंदर हूँ मैं दिगंबर हूँ। 9) नही ...
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शीर्षक - समय को तो हमे हराना ही है मै जीवन जीने नही आया हूं दुनिया में एक दिन महज मरने नही आया हूं बहुत सारी दिक्कतें हैं इस जगत में जो करती हैं हमे त्रस्त उधार-नगद में मृत्यु है यहां का सबसे बड़ा सच धर्म अपनी कहानी सुनाकर कहता है, बच, बच आर्थिक-सामाजिक विषमताएं छेड़ती हैं नया प्रसंग अभाव और इफराद में हो जाता है मन और ह्रदय दोनो तंग कमी तो है ही बहुत अधिक इस दुनिया में आज भी फंसे हुए हैं लोग मिर्ची-धनिया में कोई मनुष्य नही आज तक संपूर्ण हुआ या तो विकास तक या नैतिकता तक, सबकुछ अपूर्ण हुआ पर अब हमे बड़े बदलाव लाने हैं इस संघर्ष के विरुद्ध नही बनाने बहाने हैं हमें एक विराट-विकराल दर्शन पूरा करना है समृद्धि, वैज्ञानिक विकास और नैतिकता के संगम को उभरना है बनाना है इतना बड़ा मोर्चा जो कभी हारे नही आसमान में भले रहें चांद तारे नही जब तक हम सर्वस्व को सर्वस्व न बना देंगे जब तक हर मनुष्य को ईश्वर न बना देंगे तब तक यह अध्याय रहता अधूरा है इसके होने से ही अस्तित्व का मकसद होता पू...
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Absolutism Prevents Moral Destruction Only the belief in an absolute aspect will keep us adhered to goodness... But if we deny an absolute, our moral destruction and worldly subjugation will only be a matter of time... So, neither deny an absolute nor believe in him through the narrow prism of (one or many) religion(s).... --- *Strengthening My Worries And Anxieties* I love my anxieties, worries, introversion, fears, guilt, repentance, under-confidence, nervousness, shyness... They make me realize that I am not absolute and I am wanting to become one... This fearful frame of mind makes me humble and confirming.... If I lose these feelings, it may destroy my morality.. So, I am much in control of myself with these emotions.. ----- *The Ultimate Law:* Humans are imperfections. Inanimation (Non-Livingness) is perfect. It is perfect in the sense that it has no will, no intention, no want, no desire, no ambition... Non-Living things know no sufferings. What they have is not any s...
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शीर्षक - समय को तो हमे हराना ही है मै जीवन जीने नही आया हूं दुनिया में एक दिन महज मरने नही आया हूं बहुत सारी दिक्कतें हैं इस जगत में जो करती हैं हमे त्रस्त उधार-नगद में मृत्यु है यहां का सबसे बड़ा सच धर्म अपनी कहानी सुनाकर कहता है, बच, बच आर्थिक-सामाजिक विषमताएं छेड़ती हैं नया प्रसंग अभाव और इफराद में हो जाता है मन और ह्रदय दोनो तंग कमी तो है ही बहुत अधिक इस दुनिया में आज भी फंसे हुए हैं लोग मिर्ची-धनिया में कोई मनुष्य नही आज तक संपूर्ण हुआ या तो विकास तक या नैतिकता तक, सबकुछ अपूर्ण हुआ पर अब हमे बड़े बदलाव लाने हैं इस संघर्ष के विरुद्ध नही बनाने बहाने हैं हमें एक विराट-विकराल दर्शन पूरा करना है समृद्धि, वैज्ञानिक विकास और नैतिकता के संगम को उभरना है बनाना है इतना बड़ा मोर्चा जो कभी हारे नही आसमान में भले रहें चांद तारे नही जब तक हम सर्वस्व को सर्वस्व न बना देंगे जब तक हर मनुष्य को ईश्वर न बना देंगे तब तक यह अध्याय रहता अधूरा है इसके होने से ही अस्तित्व का मकसद होता पू...
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शीर्षक - मंडल एक तूफान है मंडल एक तूफान है समता का अनूठा अह्वान है क्रूर समय के दुष्प्रभाव को हटाने इतिहास के बने हुए अवरोध को मिटाने चलेगा यह लंबा क्योंकि विषमताएं गहरी हैं व्यवस्था में अगर प्रावधान न हो तो न्याय की देवी भी बहरी हैं इस बदलाव पर काम बहुत करना है समाज का एक व्यापक पुनरुत्थान करना है सामाजिक न्याय इसी ढांचेगत आयेगा एक स्वस्थ जहां का सपना इसी अन्तर्गत समायेगा बदलना है हमे धड़ल्ले से सामाजिक समीकरण कि फिर न छेके सदाचार को संकीर्ण वशीकरण यह देश के इतिहास में सबसे वृहत बदलाव है यह महाक्रांति की फसल के लिए उपयुक्त छिंड़काव है आरक्षण कोई भयानक दैत्य नही है वह है एक उभरता हुआ आदित्य यही सही है कुछ कड़क प्रतिबध्दता तो होनी चाहिए सार्वभौमिक न्याय की ओर वर्ना नही मिलेगा हमे एक सुदृढ मानव सभ्यता का छोर आईये इस विराट सामाजिक बदलाव में जुट जाएं समय को थामकर इतिहास के पापों से छूट जाएं । *****
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The Mandal Controversy - And I Support That Revolution: There were tens of millions crying for their lessening of a bright future And There were hundreds of millions crying for not getting the most fundamental position in the society.... It was anybody's guess who out of the two were the more needy... --- Indeed, the implementation of the Mandal Commission report was the most socially radical step taken in the independent India..... It was not exactly a revolution.. But it commenced the great social resolution... ---- Pre-Mandal days were classey, harmonious, liberal, sophisticated, perhaps they were like Pandit Jawaharlal Nehru... After Mandal, things became more realistic, tougher, challenging and more extracting. Actually, it was from then that the society actually started working on its mission... ---- They say Mandal is killing the merit.. I would say who will kill the massive eco-social divide which exists between the two parts.... ------ The ugly manifestations ...
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जातिगत आरक्षण - एक आवश्यक अनिवार्यता जातिगत आरक्षण आज एक संवैधानिक सच है। उसको कम करना या खत्म करना बहुत ही मुश्किल है। एक मत के अनुसार, जातिगत आरक्षण ने भला ज्यादा किया है, नुकसान कम। जो जातिगत आरक्षण के तहत शिक्षा और नौकरियों में भर्तियां या नियुक्तियां होती हैं, उसमे आरक्षित वर्ग के निर्धन लोग भी बहुत आते हैं। अगर हम सरकारी आंकडों पर नजर डालें, तो आरक्षित वर्ग से नौकरियों मे आ रहे हैं काफी लोग निर्धन परिवेश से हैं। दूसरी बात यह है कि, जातिगत आरक्षण का मुख्य उद्देश्य गरीबी मिटाना नही है बल्कि देश के सक्रिय क्षेत्रों में सभी वर्गो और जातियों का समावेश लाना भी है। इस हिसाब से आरक्षण, केवल आर्थिक आधार पर नही बल्कि सामाजिक और ऐतिहासिक (भेदभाव) मापदंडो के लिए लाजिमी है। जाति प्रथा सहस्राब्दीओं से इस समाज का कटु सच रहा है। इस प्रथा के सामाजिक-आर्थिक दुष्प्रभावों को ध्वस्त करने में समय तो लगेगा ही। निर्विवाद, आरक्षण से योग्यता की प्रणाली को क्षति पहुंचती है। किंतु समाज को ज्यादा सम बनाने के लिए यह व्यवस्था कठिन किंतु आवश्यक है। यह समाज एक विशाल समूह है, ज...
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शीर्षक - स्वागतम, सुस्वागतम भावी, आगामी नागरी भविष्य एक दिन दुनिया का हर देश खंडित हो जाएगा जो घौंस जमाते हैं बड़े देश छोटे देशों पर, वह सब दंडित हो जाएगा जब सारे गांव सिकुड़ और सिमट जाएंगे शहरों में जब समा जाएंगे छोटे शहर बड़े नगरों में जब राष्ट्रों का संपूर्ण औचित्य खत्म हो जाएगा जब संसाधनों का निर्धारित आधिपत्य खत्म हो जाएगा जब सबको मुहैय्या होगा सबकुछ और सबकुछ जब नहीं रहेगी संपदा सीमित लोगों में केवल कुछ-कुछ जब बड़े शहर उभरेंगे बनकर सामाजिक-आर्थिक इकाई जब उनका काम होगा प्रबंधन, नही होगी कोई लड़ाई जब इन नगर इकाईयों के बीच नही होगी कोई सेना या प्रतिस्पर्धा जब पान खाएंगे सब मीठा, जिसमे नही होगा कोई जर्दा राष्ट्र है आज की जरूरत, कल ऐसा नही होगा बदलेगी मांग और आपूर्ति की परिभाषा, उस पल पैसा नही होगा जीवन बन जायेगा सरल, संपन्न, समृद्ध स्वास्थ्य होगा सबका हृष्ट-पुष्ट, युवा की तरह जियेंगे वृद्ध गांव का चलता हुआ अस्तित्व कमजोरी है, लाचारी है नगर ही वास्तव में सफल हैं, छुड़ाना पिछड़ेपन की बीमारी ह...
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शीर्षक - जब भारत का होगा मुस्लिम प्रधानमंत्री और पाकिस्तान का होगा हिंदू वजीर-ए-आजम बात नहीं यह नामुमकिन है मुझे विश्वास है होना इसे एक दिन है जब धर्म जुनून नही एक ताकत बन जाएगा जब समाज अथाह स्वतंत्रता देकर तन जाएगा जब देशों में होगा मुकाबला आदर्शवाद लाने के लिए जब जूझेंगे सब ईश्वर का आशीर्वाद पाने के लिए कि यह टकराव या फसाद वास्तविक स्वभाव नही है अखंड अस्तित्व का क्योंकि बहुत दूर है क्लेश और घृणा मानव के केंद्र से,यह नही खंड एक मानवीय व्यक्तिव का जब पहचान नही होगी जाति, धर्म और नस्ल के आधीन जब स्वतंत्र होगी मानवीय सोच, नही होगी पूर्वाग्रहों से पराधीन क्या है हिंदू क्या है मुसलमान, सब इतिहास की घटना है तकदीर का खेल है यह, किसी का होता मुंडन किसी का होता खतना है इतिहास का चला आ रहा यह अवरोध, अब दूर होना चाहिए व्यक्ति के पूरे सत्व का नही विरोध होना चाहिए जब हर व्यक्ति स्वतंत्र होगा तब जातीय पहचान गौण हो जायेगी फिर भी कई लोगों के लिए इतिहास को विपरीत करना, एक लक्ष्य एक दौड़ हो जाएगी तब उभ...
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THE REAL LIBERATION OF INDIA, PAKISTAN & BANGLADESH: The division of the Indian (South Asian) Sub-Continent into India, Pakistan, and Bangladesh doesn't matter to me.... I may or may not agree to their reunification.... What matters to me the most is, how well each of these nationalities treats its people... And the litmus test for the public welfare is: How does each nationality treat its (religious or cultural) minorities? Well, Pakistan and Bangladesh fare very poorly on this record, so far.... They need to change this radically... Well, India used to be ardently secular. But things are somewhat different now. Muslims do not feel that much comfortable in India now. But we are confident that things will change in the near future and hardcore Secularism will again rule the roost.... Well, all three countries will change in the future..They will have to change or else they will not be able to face the commands of time and won't be able to survive not just geopolitically...
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शीर्षक - क्योंकि मंडल भवन के आगे विराट मंदिर का प्रांगण था जाति तो एक बहाना था अंतर्द्वंद को मिटाना था छ: सौ साल से सोई हुई बिरादरी को जो जगाना था पता नही यह फसाना था या अफसाना था मालूम नही कि उन्हे उठाना था या उक्साना था इसके काफी पहले एक विस्फोट हुआ था काफियों ने उसका स्वागत किया था, कईओं को अफसोस हुआ था असली भाईचारा तो सनातन में ही था उसकी एकता को बचाना ऐतिहातन भी था मंडल का जो तूफान उठा था वह बन कर एक सशक्त सामाजिक उफान उठा था जिसने छोटे भेदों को तो दूर कर दिया पर बड़े भेदभावों को और पूर कर दिया कि असली फर्क राम और भीम में नही था दोनो ही में जय थे, पर वैसा रहीम में नही था वास्तविक मूल्य वह है जो सभी मनुष्यों को एकात्म करे वह नही जो एक ही धर्म के लिए सत्नाम करे मंडल ने खत्म कर दिया सामाजिक असमता को जिसने बढ़ा दी सहधर्मिता की ममता को मंडल कुछ नही बस एक औजार बन कर रह गया अंतः के भेद को कम कर के अंतर के भेद को विशाल करके बह गया जाति ही तो रोडा थी हिंदुत्व ...
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*POTENT POINTS* We can never absolutely, completely project the future... As we think or conceptualize the future, the possibility of that (exact) projection gets diluted & excluded from (our probable) existence.... ---- Everything and everyone has continuity... The continuity from inheritance is called past..The continuity into the coming time is called the future.. ---- We can dissolve the past and coalesce the future into this very moment, but the first question is do we want it.... ---- Continuity is not deeply and not thoroughly based on karma..Continuity doesn't necessarily reflect karma, it is karma that largely reflects continuity... --- We can re-engineer our continuity & karma and re-allign them by massive mental churning and overhauling...But this action requires some seemingly tough efforts.... --- Continuity can be reigned-in and massively re-oriented to create a better and happier life.. ---- Humans have the potential ability t...
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शीर्षक - केवल नैतिकता ही है वास्तविक, वही है हमारे लिए आज महाशिवरात्रि के दिन एक सरल स्पष्ट उद्घोषणा करता हूं मानवीय पर्तों को हटाने की सबल सशक्त घोषणा करता हूं कि क्यों मानते हैं हम ईश्वर और उनके विभिन्न रूपों को क्या पायेंगे हम जलाकर अगरबत्ती और धूपों को यह आस्तिकता भी तो एक क्लिष्ट रचना है क्योंकि हमे पता है अंततः कुछ नही बचना है जैसे प्याज की बहुत सारी पर्तें होती हैं वैसे ही आस्था की बहुत सारी शर्तें होती हैं कितने पहलू हैं पराशक्ति के विश्वास में यह नही आता आसानी से हमारे आभास में कितनी सारी जरूरतें हैं हम मनुष्यों की, सभी पूरी होनी चाहिए जीवन की आपाधापी में हमारे पास एक महेंद्र सिंह धोनी होने चाहिए फिर, अहम देता है दुख तो अहंकार को हटाना है विनम्र बन कर ही हमे अथाह सुख लाना है हम शौर्य के उपासक हैं, हमे भव्यता की जरूरत है ईश्वर का नायकवाद तो, बहुत बेहत खूबसूरत है एक होना चाहिए आधार, जो डूबते का सहारा हो धर्म और अध्यात्म के बिना कौन है, जो हर पल हमारा हो इंसान का जीवन नही गु...
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शीर्षक - विग्यान देगा हमें मुक्ति और संपूर्ण आनंद एक ही चुनौती है सबसे विशाल जीतना है हमको महाकाल सारा द्वंद है इसी की ओर समय ही बनाता है हमे कायर और चोर समय चलता है एक प्रवाह की तरह सबकुछ होता है बिना किसी ठोस वजह सारा द्वैत है समाया हुआ है विराट समय में क्यों हम बैठें हैं समर्पित विनय में अध्यात्म ने हमे सिखाया है समय से उपर उठने का तरीका कहते हैं उसे मोक्ष या निर्वाण, जिससे जग जाता है जीता पर वह मोक्ष या निर्वाण एक व्यक्तिगत प्रयास है वह त्याग से होता है, उसमे नही कोई व्यापक आवास है हमे कुछ ऐसा करना है जो सामूहिक और सार्वभौमिक हो जो बदल दे यथार्थ को, ऐसा कोई मेकेनिक हो हमे विग्यान में एकदम तीव्र हो जाना है उसमे प्रगाढ़ होकर हमे अत्यंत वीर हो जाना है अत्यंत मेहनत, एकाग्रता और जुझारूपन से हमे पाना है एक एसा परिवर्तन जिससे मिल जाए हमे मुक्ति कूछ ऐसा हो अवतरण समय ईश्वर का जोर है, ईश्वर की ताकत है पर मनुष्य कौन सा कम है, जीतना उसकी आदत है खत्म करने हैं हमे सारे दं...
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शीर्षक - विकास की यात्रा में बहुत उज्जवल है मनुष्य का भविष्य समय चल रहा है सतत, लगातार जीवन है कभी स्वप्निल, तो कभी है दुश्वार स्थितियां खड़ी करती हैं बड़ी-बड़ी चुनौतियां संघर्ष करके हटाते हैं हम मुश्किल पनौतियां जो कुछ भी होता है, एक उदेश्य से होता है अखिल ब्रम्हांड में कुछ भी नही है, जो खोता है चीजें निरंतर कुल मिलाकर सुधर रही हैं कोई भी घटना बिना लाभ के नही गुजर रही है बहुत विकास किया है मनुष्य ने 10,000 साल के सभ्य इतिहास में सुलझी हैं गुत्थियां, सिमटे हैं रहस्य इंसान के निवास में पर जो अभी तक हुआ है वह बहुत ही कम है पिक्चर देखना बाकी है, अभी ट्रेलर भी नही हुआ खत्म है अनंत हैं संभावनाएं, अनंत विकास के स्रोत हैं मनुष्य के लिए छोटा पड़ जाए ब्रम्हांड, यह कहना नही अतिशयोक्त है जीतना है हमे गरीबी और अर्थव्वस्था के असंतुलन को हरानी है बीमारियां और मृत्यु के आगमन को हमे करना है अथक प्रयास प्राप्त करने एक सुनहरी मंजिल करते रहना है हमेशा कुछ सृजनात्मक, इतना निश्छल जैसे हो सलिल धर...