शीर्षक - जब बन जाओगे बड़े तो छोटापन बोझ लगेगा


मानवता के अक्षमता का कारण साफ था  

पर उनमे से किसी को भी नही यह गुनाह माफ था 

क्योंकि कानून भी यही कहता है बार-बार 

नियम की अग्यानता से नही होती है बेगुनाही बरकरार   

अक्सर लोग इसी एहसास से वंचित हैं 

काबलियत है मगर वास्तविक बोध संकुचित हैं 

मनुष्य इसलिए दुखी है क्योंकि वह तात्कालिक है 

वह नही जानता सार्वभौमिक होना ही लाता अवस्था वास्तविक है

और इस तात्कालिकता के केंद्र में खुद से प्यार है 

पर यही प्यार करता मनुष्य का जीवन दुश्वार है 

खुद से प्यार मनुष्य के पतन का मुख्य कारण है 

निज-धर्म और निज-देश से प्यार भी इसी आत्म-रति का आवरण है 

हमे स्थानीयता से बढ़ना है सार्वभौमिकता तक 

हमे क्षण-क्षण से जाना है सर्वस्वता तक 

इतना मुश्किल नही है इस काबलियत को प्राप्त करना 

छोड़ना है हमे छोटापन, मन को है व्याप्त करना

जब बन जाओगे बड़े तो छोटापन बोझ लगेगा 

देना तात्कालिक प्रतिक्रिया, सामान्य नही, एक रोग लगेगा।

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