शीर्षक- मायावादियों को द्वंद से क्यों है इतना प्यार


करीब-करीब सभी अपने आप को सही मानते हैं


थोड़ा ही छानते है, पर कहने को बहुत कुछ जानते हैं 


कोई अहम में है, कोई सकारात्मकता में 


कोई वहम में है, कोई नकारात्मकता में 


वे सभी देने में कम, और अधिक लेने में है 


एक-आध को छोड़कर, सभी मायावाद के खेमे में हैं 


समझ नही आती मुझे इतनी सी बात 


क्यों वे ढूंढते हैं असंतोष दिन हो या रात 


कहते हैं वह खुशी से है हमे अधिक प्यार 


फिर क्यो नही मानते वह परमात्मा की प्रभुसत्ता और उनकी सरकार


सबकी अच्छाई की अलग-अलग परिभाषा है 


किसी को कायदे से प्यार है, तो किसी को शांति से आशा है


पर सब किसी न किसी तरह से खुदी को बढाते हैं 


अपने-आप को ही मानकर औरों को घटाते हैं 


फर्क है उन सब के बीच में, थोड़ा ज्यादा, थोड़ा कम 


पर उन सभी को पसंद है शोर-शराबा और गम 


पर एक अपवाद है जो शांति और अहिंसा का अनुसरण करता है 


वह खुदी को गंवा कर, सदाचार का आचरण धरता है 


जैसे ईश्वर अकेले हैं, वैसे वह भी अकेला है 


सभी मानते है उसको, उसने ऐसा खेल खेला है 


संघर्ष का यह दौर है, कठिन इम्तिहान है 


सुंदर यह जहान है, अगर सही इंतजाम है 


सदाचार को ही बढना है, दुराचार को नही गढ़ना है 


सारे बुराईयों को एक दिन अच्छाई में ही तो पड़ना है


द्वैत को एक दिन तो अद्वैत में ही बदलना है 


सारे मायावादायों को अंततः कैवल्य में ही सम्हलना है


समझ जाओ जल्दी, तुम्हे किसका है इंतजार


मायावादियों को द्वंद से क्यों है इतना प्यार?


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