जैन धर्म और नव-जैन धर्म का सार


1) जैन धर्म एक अनुपम धर्म है जो अटूट तपश्चर्य और सर्वाधिक अहिंसा को अमल में लाकर व्यक्ति को मनुष्य से ईश्वर बना देता है। 


2) जैन धर्म ही एक ऐसा धर्म है जो कभी भी, किसी भी स्थिति में अहिंसा से समझौता नहीं करता। 


3) जैन धर्म बहुत ही प्रगाढ और गहन है। वह अहिंसा और तपश्चर्य के पालन मे बहुत अधिक कार्यशील है। 


4) किसी रचियता ईश्वर को न मानकर और आत्मा को ही परमात्मा मानकर जैन धर्म एक साधक को पूर्णतः सशक्त कर देता है। 


5) जैन धर्म शाकाहार को पूर्णतः अनिवार्य करके एक नयी, विराट और भव्य जीवन शैली प्रस्तुत करता है। 


6) जैन धर्म की तीन अद्वितीय विशेषताएं है: 


हर मनुष्य वस्तुतः परमात्मा है और कोई परमात्मा नही है;


अटूट अहिंसा के पालन से मनुष्य के नये कर्म बनने बंद हो जाते है; 


घोर तपश्चर्य से मनुष्य के पुराने कर्म कट जाते हैं।


7) जैन धर्म न तो आत्मा के सिवाय किसी और ईश्वर को मानता है और न ही इन बातों को कि सृष्टि को ईश्वर ने रचा है और एक दिन यह सारी दुनिया प्रलय में नष्ट है जायेगी। जैन धर्म के अनुसार ब्रम्हांड शाश्वत है। वह हमेशा था और कभी नही मिटेगा। 


8) जैन धर्म के अंदर कोई जात-पात का भेद-भाव नही है। कोई भी जाति या धर्म का व्यक्ति जैन मंदिर में प्रवेश कर सकता है। कोई भी व्यक्ति जैन धर्म स्वीकार कर सक्ता है। 


9) जैन धर्म में कुल 24 तीर्थंकर हैं जिन्होने इस शाश्वत धर्म को पुनः स्थापित किया है। यह तीर्थंकर ईश्वर नही हैं, वे केवल पथ-प्रदर्शक हैं जिन्होने आनंद प्राप्त करने का रास्ता दिखाया है। 


10) जैन धर्म महिलाओं को समानता देता है।श्वेतांबर संप्रदाय मानता है कि साधु और साधवी दोनो ही मोक्ष के बराबर के हकदार हैं। श्वेतांबर मान्यता के अनुसार 19स्वे तीर्थंकर मल्लीनाथ एक महिला थीं। 


जहां तक दिगंबर की बात है, वह मानते हैं कि मुक्ति पाने के लिए सबकुछ त्यागना आवश्यक है, यहां तक की वस्त्र भी। चूंकि महिलाओं के लिए यह संभव नही है केवल इसीलिए उन्हें एक नया जन्म लेना पड़ेगा जिसमे उन्हे (पुरुष) साधू बनकर, कपड़े भी त्यागकर तपश्चर्य करना होगा और तभी उन्हे कैवल्य मिलेगा। वरना और महिलाओं से कोई भेदभाव नहीं है। 


11) जैन धर्म एक नयी दुनिया का द्वार है जहां क्लिष्ट जिंदगी के सामने कठिन तपश्चर्य और अटूट अहिंसा की ताकतों से हम दुख को मिटा सक्ते हैं। 


*टिप्पणी:*


*नव-जैन धर्म का सार*


1) दिगंबर संप्रदाय ही वास्तव में मूल जैन धर्म है। श्वेतांबर संप्रदाय की मान्यता समाज और जगत के साथ समझौते से प्रेरित है। 


2) वास्तव में जैन दिगंबर बनना है तो सारी जटिलताएं छोड़ दो, सारे लाग-लपेट त्याग दो। तपश्चर्य और अहिंसा का सही मायने है, हमेशा सहना और कभी कुछ न कहना। हमेशा सहना तपश्चर्य है और कभी कुछ न कहना अहिंसा है। 


3) अगर यह सब आपको पसंद है और आप इन तौर-तरीकों को अपनाना चाहते हैं तब नव-जैन धर्म में आपका स्वागत है। 


*जय जिन*


*जय तपश्चर्य*


*जय अहिंसा।*


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