शीर्षक - और हमने कर्मांड रच दिया
जीवन के मिले-जुले हुए संगम में
कभी मधुर, कभी कड़वे उपवन में
सतत बढाते हम कदम हैं आगे
सिलते हैं भविष्य के धागे
आज तक ली शरण है ब्रम्ह की
या फिर जिन की, या फिर धम्म की
पर सुलझी नही जीवन की गुत्थी
दांत पीसे हैं, बंद करी है मुठ्ठी
आईये अब हम सजग हो जांए
अब नही अजब में खो जाएं
क्या होगा माया को बढ़ा के
कल्पना को और अधिक चढा के
अध्यात्म भी तो है एक बुनावट
उसमे है बहुत अधिक सजावट
वास्तविक जीवन के लिए क्या है अध्यात्म में
दुनिया को छोड़कर बसते है परमात्म में
एक सीधे-सरल जीवन को इतना क्लिष्ट कर दिया
दुख और सुख को इतना विशिष्ट कर दिया
अरे, बस हम जीते हैं और मर जाते हैं
न कुछ लाते हैं, न कुछ कर जाते हैं
अच्छाई तो खुशी ही देती है, अभी इसी वक्त
क्यों है अपने-आप के लिए हम इतने अधिक सख्त
कर्मो का इतना विस्तृत खिताब क्यों
हर एक अच्छाई और हर एक बुराई का ऐसा हिसाब क्यों
धर्म, अध्यात्म ने सिखाई ऐसी कठिन तपस्या
जीवन खो गया, पर रह गई समस्या
हमे सुलझाना है इस जीवन को
बनाना है सुनहरा इस सुन्दर वन को
अटूट अच्छाई का अनुसरण करेंगे
नहीं चाहेंगे निर्वाण, केवल सरल अवतरण करेंगे
एक नयी शैली से करेंगे जीवन-यापन
करेंगे एक नई व्यवस्था का उद्यापन
जहां अच्छाई होगी सबकुछ, बिना किसी सीमित चाह के
नही बसाएंगे अपनी दुनिया सामने और किसी राह के
ब्रम्ह की जगह अच्छाई को चुनकर
एक सहज, सरल समय को बुनकर
ब्रम्हांड को हटाकर एक नया यथार्थ रख दिया
और हमने कर्मांड रच दिया।
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