जातिगत आरक्षण - एक आवश्यक अनिवार्यता


जातिगत आरक्षण आज एक संवैधानिक सच है। उसको कम करना या खत्म करना बहुत ही मुश्किल है। एक मत के अनुसार, जातिगत आरक्षण ने भला ज्यादा किया है, नुकसान कम। 

जो जातिगत आरक्षण के तहत शिक्षा और नौकरियों में भर्तियां या नियुक्तियां होती हैं, उसमे आरक्षित वर्ग के निर्धन लोग भी बहुत आते हैं। अगर हम सरकारी आंकडों पर नजर डालें, तो आरक्षित वर्ग से नौकरियों मे आ रहे हैं काफी लोग निर्धन परिवेश से हैं। 

दूसरी बात यह है कि, जातिगत आरक्षण का मुख्य उद्देश्य गरीबी मिटाना नही है बल्कि देश के सक्रिय क्षेत्रों में सभी वर्गो और जातियों का समावेश लाना भी है। इस हिसाब से आरक्षण, केवल आर्थिक आधार पर नही बल्कि सामाजिक और ऐतिहासिक (भेदभाव) मापदंडो के लिए लाजिमी है। 

जाति प्रथा सहस्राब्दीओं से इस समाज का कटु सच रहा है। इस प्रथा के सामाजिक-आर्थिक  दुष्प्रभावों को ध्वस्त करने में समय तो लगेगा ही।

निर्विवाद, आरक्षण से योग्यता की प्रणाली को क्षति पहुंचती है। किंतु समाज को ज्यादा सम बनाने के लिए यह व्यवस्था कठिन किंतु आवश्यक है। 

यह समाज एक विशाल समूह है, जहां बिना अगड़ों को घटाये पिछड़ों को बढ़ाना है। इसीलिए क्रांति नही होनी चाहिए किंतु एक असरदार लोकतांत्रिक परिवर्तन जरूरी है। 

मंडल आयोग की सिफारिशों को उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों ने भी अपनी स्वीकृति दी थी। 

जातिगत आरक्षण एक सामाजिक प्रक्रिया है जो समय की जरूरत है, इसीलिए वह उभरी है। जब इसकी आवश्यकता नही रहेगी तो यह स्वतः धीरे-धीरे भंग हो जाएगी। 

निजी क्षेत्र की नौकरियों का बढता वर्चस्व और सरकारी नौकरियों का धीरे-धीरे सीमित होता जाना, आरक्षण की तीव्र निष्ठुरता को मंद कर देगा और समाज समान हो कर समरस भी हो जाएगा ।

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