शीर्षक - और धरती नामक गुलिस्तां का स्वाहा हो गया


यह तो होना ही था एक दिन 

कब तक रहते हम काल से खिन्न 

कितने बार उल्का पिंड पास से फिसला था 

पर इस बार उसने हम सब को निगला था 

यह दुख नही है कि सब क्यों खो गया 

क्यों हम सब का जीवन इतने जल्दी सो गया 

गिला इसका है कि हम सब हिल-मिल कर क्यों नही रहे 

क्यों नही हम बहाव में आसानी से बहे 

क्यों हम सब में टकराव बना रहा 

क्यों हम सभी में बिखराव ठना रहा 

क्यों हम ढूंढते रहे एक दूसरे की कमियां सदा 

क्यों हमने नही माना कि काल ही है अंततः 

मुझे यह नही पता कि स्वर्ग नर्क है कि नही 

पर हमने नही किया वह जो ही होता सही 

जीवन गंवा के चले गए हम 

नही कर पाये हम सभी को सम 

क्या हमे पाना था जो हमने नही पाया 

क्यों भ्रम का काला साया सदा हम पर रहा छाया 

हम सब को सदा लगा बात इतनी सी ही थी 

पर यह जो इतनी ही थी, वह कितनी कितनी ही थी 

बुराई तो वास्तव में बुराई ही थी 

उसमे नकारात्मकता की महक और रुसवाई भी थी 

चलो जो हुआ वह हो ही गया 

अब तो है निर्वाण ही, सतत शून्य का सिला

अंततः सारे कष्टों का नौ दो ग्यारह हो गया

और धरती नामक गुलिस्तां का स्वाहा हो गया ।

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