शीर्षक - केवल नैतिकता ही है वास्तविक, वही है हमारे लिए


आज महाशिवरात्रि के दिन एक सरल स्पष्ट उद्घोषणा करता हूं 

मानवीय पर्तों को हटाने की सबल सशक्त घोषणा करता हूं  

कि क्यों मानते हैं हम ईश्वर और उनके विभिन्न रूपों को 

क्या पायेंगे हम जलाकर अगरबत्ती और धूपों को 

यह आस्तिकता भी तो एक क्लिष्ट रचना है 

क्योंकि हमे पता है अंततः कुछ नही बचना है 

जैसे प्याज की बहुत सारी पर्तें होती हैं 

वैसे ही आस्था की बहुत सारी शर्तें होती हैं 

कितने पहलू हैं पराशक्ति के विश्वास में 

यह नही आता आसानी से हमारे आभास में

कितनी सारी जरूरतें हैं हम मनुष्यों की, सभी पूरी होनी चाहिए 

जीवन की आपाधापी में हमारे पास एक महेंद्र सिंह धोनी होने चाहिए 

फिर, अहम देता है दुख तो अहंकार को हटाना है 

विनम्र बन कर ही हमे अथाह सुख लाना है 

हम शौर्य के उपासक हैं, हमे भव्यता की जरूरत है 

ईश्वर का नायकवाद तो, बहुत बेहत खूबसूरत है 

एक होना चाहिए आधार, जो डूबते का सहारा हो 

धर्म और अध्यात्म के बिना कौन है, जो हर पल हमारा हो 

इंसान का जीवन नही गुजर सकता बिना कल्पना के 

ईश्वर के बिना कौन है जो बचाये हमे सारी भर्त्सना से 

सबसे मुश्किल है ब्रम्हचर्य, जो न हो पाये अनेको से 

इसीलिए शायद बनाय लिया है इसे आधार बहुत सारे दीनों ने 

इस अपूर्ण जगत में जब कुछ भी पूर्ण नही मिला 

तो मनुष्य ने बना लिया ईश्वर और इबादत का सिला 

धर्म तो बना है मनुष्य की सहूलियत के लिए 

क्यों बन गया फिर यह वजह आपसी अदावत के लिए 

अब जरूरत है हमे चीजों को प्रत्यक्ष लेना 

लेना है बहुत ही कम और है समक्ष बहुत ज्यादा देना 

हे ईश्वर मेरे सारे अवगुणों को माफ करना 

मैने मानी है अटूट अच्छाई, मेरे गुनाहों को साफ करना 

धर्म, मै बना हूं, बना हूं, बस तुम्हारे लिए 

केवल नैतिकता ही है वास्तविक, वही है हमारे लिए 

जब तक जिऊंगा, अच्छाई के लिए ही जिऊंगा 

स्वर्ग तो नही पता, सतत सदाचार का रस ही पीऊंगा। 

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