शीर्षक -  मैं  हूँ तर्क


देता पुरानी मान्यताओं को चुनौती 


हटाने सारी परंपराओं में धंसी हुई पनौती 


इंसान के लिए उठता हूँ ऊपर और अपार 


खड़ा हो जाता हूँ ईश्वर के विरुद्ध बन के मनुष्य का कर्णधार 


जानता हूँ  विरोध में शांति नहीं है 


पर मुझे इसमे कोई भी भ्रांति नही है 


अगर व्यवस्था को मान लिया तो कैसे बढ़ाऊंगा सभ्यता को आगे 


तभी बढेगा मनुष्य जब वह समर्पण को है त्यागे 


कितने विह्वल हुए हैं, कितने हुए हैं विराट 


फ्राॅयड, डार्विन, मार्क्स, आईंस्टाईन और अन्य सम्राट 


जिन्होने नही माना है, एक लीक को, एक ढर्रे को 


जिन्होने उठा के दूर फेंका है अग्यानता के पर्दे को


मैं तो लड़ूंगा, भिडूंगा बने-बनाये तरीकों के खिलाफ 


तभी हो पायेगा इंसान का वास्तविक विकास 


मनुष्य उपजा है बहुत कुछ कर जाने के लिए 


वह नही आया है, अन्य पशुओं की तरह समय में बह जाने के लिए 


करना है कुछ बड़ा, करना है बहुत कुछ हासिल 


लगे रहना है इस सोच में सतत, प्रयत्न भले हो फाजिल 


लोगों को जुझारू बनाना है 


चैन की नींद से उन्हे उठना सिखाना है 


मैं लाऊंगा महाक्रांति भले जितने हो वितर्क 


क्योंकि मैं हूँ सबसे अनूठा, अलबेला, मै हूँ तर्क।


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