शीर्षक - क्योंकि मंडल भवन के आगे विराट मंदिर का प्रांगण था
जाति तो एक बहाना था
अंतर्द्वंद को मिटाना था
छ: सौ साल से सोई हुई बिरादरी को जो जगाना था
पता नही यह फसाना था या अफसाना था
मालूम नही कि उन्हे उठाना था या उक्साना था
इसके काफी पहले एक विस्फोट हुआ था
काफियों ने उसका स्वागत किया था, कईओं को अफसोस हुआ था
असली भाईचारा तो सनातन में ही था
उसकी एकता को बचाना ऐतिहातन भी था
मंडल का जो तूफान उठा था
वह बन कर एक सशक्त सामाजिक उफान उठा था
जिसने छोटे भेदों को तो दूर कर दिया
पर बड़े भेदभावों को और पूर कर दिया
कि असली फर्क राम और भीम में नही था
दोनो ही में जय थे, पर वैसा रहीम में नही था
वास्तविक मूल्य वह है जो सभी मनुष्यों को एकात्म करे
वह नही जो एक ही धर्म के लिए सत्नाम करे
मंडल ने खत्म कर दिया सामाजिक असमता को
जिसने बढ़ा दी सहधर्मिता की ममता को
मंडल कुछ नही बस एक औजार बन कर रह गया
अंतः के भेद को कम कर के अंतर के भेद को विशाल करके बह गया
जाति ही तो रोडा थी हिंदुत्व को बढाने में
अब कौन उठेगा मूल धर्म-निरपेक्षता को बचाने में
क्योंकि विराट हिंदुत्व में न कोई दलित, न ब्राम्हण था
क्योंकि मंडल भवन के आगे विराट मंदिर का प्रांगण था ।
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