शीर्षक - समय को तो हमे हराना ही है


मै जीवन जीने नही आया हूं 


दुनिया में एक दिन महज मरने नही आया हूं 


बहुत सारी दिक्कतें हैं इस जगत में 


जो करती हैं हमे त्रस्त उधार-नगद में 


मृत्यु है यहां का सबसे बड़ा सच 


धर्म अपनी कहानी सुनाकर कहता है, बच, बच  


आर्थिक-सामाजिक विषमताएं छेड़ती हैं नया प्रसंग 


अभाव और इफराद में हो जाता है मन और ह्रदय दोनो तंग 


कमी तो है ही बहुत अधिक इस दुनिया में 


आज भी फंसे हुए हैं लोग मिर्ची-धनिया में 


कोई मनुष्य नही आज तक संपूर्ण हुआ 


या तो विकास तक या नैतिकता तक, सबकुछ अपूर्ण हुआ 


पर अब हमे बड़े बदलाव लाने हैं 


इस संघर्ष के विरुद्ध नही बनाने बहाने हैं 


हमें एक विराट-विकराल दर्शन पूरा करना है 


समृद्धि, वैज्ञानिक विकास और नैतिकता के संगम को उभरना है 


बनाना है इतना बड़ा मोर्चा जो कभी हारे नही 


आसमान में भले रहें चांद तारे नही 


जब तक हम सर्वस्व को सर्वस्व न बना देंगे


जब तक हर मनुष्य को ईश्वर न बना देंगे


तब तक यह अध्याय रहता अधूरा है


इसके होने से ही अस्तित्व का मकसद होता पूरा है 


करना कुछ नही बस अपनी क्षमता को जगाना है 


और उसका अपनाकर अनंत में समा जाना है 


कि इससे नीचे कोई अख्तियार नही होना चाहिए 


कि जैसे एक नेक गांव में कोई सियार नही होना चाहिए 


यह हो जाए तो सबकुछ हासिल है 


वर्ना होकर भी कुछ नही होता दाखिल है


कब तक हम यों ही जीते रहेंगे, मरते रहेंगे 


काल-चक्र के आगे अपनी आहें भरते रहेंगे 


जब तक हम नहीं मुड़ते इस परम-परिवर्तन की ओर 


नहीं मिलेगा हमें अस्तित्व का एक भी साबित छोर 


आईये इस संपूर्ण क्रिया में हम जुट जायें 


या तो लुटा दें सबकुछ या फिर लुट जाएं 


समय को तो अंततः हमे हराना ही है 


नही और कोई विश्राम-ग्रह, बस एक ठिकाना ही है। 


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