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 शीर्षक -  मैं  हूँ तर्क देता पुरानी मान्यताओं को चुनौती  हटाने सारी परंपराओं में धंसी हुई पनौती  इंसान के लिए उठता हूँ ऊपर और अपार  खड़ा हो जाता हूँ ईश्वर के विरुद्ध बन के मनुष्य का कर्णधार  जानता हूँ  विरोध में शांति नहीं है  पर मुझे इसमे कोई भी भ्रांति नही है  अगर व्यवस्था को मान लिया तो कैसे बढ़ाऊंगा सभ्यता को आगे  तभी बढेगा मनुष्य जब वह समर्पण को है त्यागे  कितने विह्वल हुए हैं, कितने हुए हैं विराट  फ्राॅयड, डार्विन, मार्क्स, आईंस्टाईन और अन्य सम्राट  जिन्होने नही माना है, एक लीक को, एक ढर्रे को  जिन्होने उठा के दूर फेंका है अग्यानता के पर्दे को मैं तो लड़ूंगा, भिडूंगा बने-बनाये तरीकों के खिलाफ  तभी हो पायेगा इंसान का वास्तविक विकास  मनुष्य उपजा है बहुत कुछ कर जाने के लिए  वह नही आया है, अन्य पशुओं की तरह समय में बह जाने के लिए  करना है कुछ बड़ा, करना है बहुत कुछ हासिल  लगे रहना है इस सोच में सतत, प्रयत्न भले हो फाजिल  लोगों को जुझारू बनाना है  चैन की नींद से उन्हे उठना सिख...
 शीर्षक- आइए एक ऐसा विश्व आंदोलन खड़ा करते हैं मोक्ष का है लक्ष्य  कोई न ले इसे भक्ष पाना सभी को है यह मुकाम  क्यों न संगठित होकर करें यह काम  इस तथ्य को मानकर  एक संगठन स्वीकार कर  कि हम सब आत्माएं हैं  हम सब परमानंद को चाहे हैं  आत्मा स्व्यं ही परमात्मा है  और नहीं कोई विश्वात्मा है  अहिंसा को कुछ इस तरह बांधना है  सभी को उस डोरी को फांदना है  एक घेरे में लाकर  एक बंधन बनाकर  करना है विराट विकास  जो उत्तेजित कर दे सारे श्वास  समाज और अर्थव्यवस्था को सुधारकर  एक सर्वसंपन्न जहां बनाकर  विग्यान और तकनीकी को ऊपर चढाकर  मनुष्य को शारीरिक अमरत्व दिलाकर  जब सामाजिक-आर्थिक विषमताएं खत्म होंगी  जब वैग्यानिक-तकनीकी क्षमताएं सर्वप्रथम होंगी  तब बरसेगी अकूत नैतिकता  जिसमे झिलमिलाएगी संपूर्ण मानवता  तब ब्रम्हांड का एकाकार होगा  उससे बढ़िया नही कोई आकार होगा  तब सर्वस्व आतमापूर्ण हो जायेगा  तब अस्तित्व संपूर्ण हो जायेगा  हर व्यक्ति जो वास्तव में था, वही हो जाएग...
 शीर्षक - जब मिथ्याएं मिटायेंगी मिथक मिथ्या को छोड़ो मत  संघर्ष को मरोड़ो मत  मिथ्यों की बड़ी जरूरत है  उनके बिना सबकुछ बदसूरत है  मिथ्या चाहिए हमें मिथकों को मिटाने के लिए  उनकी जरूरत है हमे दुनिया से बुराई हटाने के लिए  क्या नहीं लिया था भगवान कृष्ण ने अधर्म का सहारा  जब उन्हे जीतना था धर्म-युद्ध, बदलना था सारा नजारा  हमे अगर बनाना है एक शांतिपूर्ण संसार  जिसमे प्रबल और प्रशस्त हो अहिंसा का अभिसार  तो हमें मिथ्या को जुटाना होगा  एक और एक को ग्यारह बनाना होगा  मनुष्य के मन और जीवन में बहुत क्लिष्टता है इस यथार्थ को बदलना है हमें, यह निश्चित सा है  जब तक नहीं उमड़ता एक व्यापक आंदोलन  जो निरस्त कर दे बुराई को और मिटा दे सारी अड़चन  आइये जुटायें एक प्रबल और प्रशस्त ऊर्जा  जिसका कोई सानी न हो, जिसके ऊपर न हो कोई दूजा  अगर दुनिया की कड़वाहट को झुटलाना है  अगर दुनिया को अच्छी तरह से बदल के जाना है  तब हमें अनेक मिथ्याओं को अपनाना होगा  उससे संसार की कड़वाहट को भगाना होगा  मिथ्या एक ज...
जैन धर्म और नव-जैन धर्म का सार 1) जैन धर्म एक अनुपम धर्म है जो अटूट तपश्चर्य और सर्वाधिक अहिंसा को अमल में लाकर व्यक्ति को मनुष्य से ईश्वर बना देता है।  2) जैन धर्म ही एक ऐसा धर्म है जो कभी भी, किसी भी स्थिति में अहिंसा से समझौता नहीं करता।  3) जैन धर्म बहुत ही प्रगाढ और गहन है। वह अहिंसा और तपश्चर्य के पालन मे बहुत अधिक कार्यशील है।  4) किसी रचियता ईश्वर को न मानकर और आत्मा को ही परमात्मा मानकर जैन धर्म एक साधक को पूर्णतः सशक्त कर देता है।  5) जैन धर्म शाकाहार को पूर्णतः अनिवार्य करके एक नयी, विराट और भव्य जीवन शैली प्रस्तुत करता है।  6) जैन धर्म की तीन अद्वितीय विशेषताएं है:  हर मनुष्य वस्तुतः परमात्मा है और कोई परमात्मा नही है; अटूट अहिंसा के पालन से मनुष्य के नये कर्म बनने बंद हो जाते है;  घोर तपश्चर्य से मनुष्य के पुराने कर्म कट जाते हैं। 7) जैन धर्म न तो आत्मा के सिवाय किसी और ईश्वर को मानता है और न ही इन बातों को कि सृष्टि को ईश्वर ने रचा है और एक दिन यह सारी दुनिया प्रलय में नष्ट है जायेगी। जैन धर्म के अनुसार ब्रम्हांड शाश्वत है। वह हमेशा था और...
शीर्षक-  जब धरा बनेगी स्वर्ग सारे जीवों का कल्याण जब बन जायेगा सबका निर्वाण  जब समाज से सारा अभाव हट जायेगा  जब संसाधनों की कमी का मुद्दा मिट जाएगा जब विग्यान और तकनीकी अपने चरम पर होंगी  जब जीवन अनंत और स्वयं मृत्यु अपने क्रिया करम पर होगी  जब नैतिकता में मनुष्य इतना ऊपर चढ़ जाएगा  जब ईसा, बुद्ध, कृष्ण, महावीर से हर मनुष्य आगे बढ़ जाएगा  जब पृथ्वी का राज संपूर्ण ब्रम्हांड पर होगा जब हर मानव का जीवन पूर्णतः सुंदर कांड सा होगा  जब प्रेम की हिम गिरेगी दुनिया-भर में जब हर सीता चुनेगी अपने राम स्वयंवर में  जब शीतल रहेगा हमेशा सभी का तन, मन, धन  जब चलेगी सदा ठंडी हवा, खुशियों महकेंगी हर आंगन  जब विग्यान और प्रग्यान का होगा अनोखा संगम  जब बड़ी चीजें लायेंगी छोटे परिवर्तन  जब छोटी बातों से मिलेगा बहुत बड़ा समर्थन  जब लोगों की व्यवस्था पूर्णतः बदल जाएगी  जब सारे शिकवे, शिकायतें सुलझ जायेंगी  एसा स्वर्णिम युग आना ही है, आ के रहेगा  हर मनुष्य इस स्थिति को चाहता है, और पा के रहेगा  बस चलते रहो सतत अच्छाई की ओ...
शीर्षक- मैं दिगंबर हूँ 1) भले नही त्यागे हो मैने कपड़े-लत्ते खेलता नहीं कभी भी मैं बनावटी पत्ते  स्वार्थ से मुक्त एक स्वच्छंद अंबर हूँ मैं दिगंबर हूँ।  2) करता हूँ अहिंसा को प्रशस्त  बनाना है जीवन को उच्चस्त कोई अपेक्षा नहीं, मस्त कलंदर हूँ मैं दिगंबर हूँ।  3) सदाचार कभी हारता नही  उसका मृत्यु से कोई वास्ता नही  देवों में राजा इंद्र हूँ मैं दिगंबर हूँ।  4)  जिनों का पैगाम है  एक नहीं चौबीस का आह्वान है सैंकड़ों  गुरुओं का स्वयंवर हूँ  मैं दिगंबर हूँ।  5) महावीर स्वामी का कायदा है  इसमें बहुत ज्यादा फायदा है  पालन में इसके निमग्न अगर हूं  मैं दिगंबर हूँ।  6)  तपश्चर्य का ऐलान है  आदिनाथ से आया हुआ फरमान है  मनुष्य नहीं कदाचित बंदर हूँ  मैं दिगंबर हूँ।  7) आत्मा में इत्मीनान है  उससे बड़ा नही कोई ईमान है  शांति में भी अंधड़ हूँ मैं दिगंबर हूँ।  8) कटिबद्ध हूँ आनंद के लिए  अपने लिए ही नही सर्वस्व के लिए  जलाशय हूँ , समुंदर हूँ  मैं दिगंबर हूँ।  9) नही ...
 शीर्षक - समय को तो हमे हराना ही है मै जीवन जीने नही आया हूं  दुनिया में एक दिन महज मरने नही आया हूं  बहुत सारी दिक्कतें हैं इस जगत में  जो करती हैं हमे त्रस्त उधार-नगद में  मृत्यु है यहां का सबसे बड़ा सच  धर्म अपनी कहानी सुनाकर कहता है, बच, बच   आर्थिक-सामाजिक विषमताएं छेड़ती हैं नया प्रसंग  अभाव और इफराद में हो जाता है मन और ह्रदय दोनो तंग  कमी तो है ही बहुत अधिक इस दुनिया में  आज भी फंसे हुए हैं लोग मिर्ची-धनिया में  कोई मनुष्य नही आज तक संपूर्ण हुआ  या तो विकास तक या नैतिकता तक, सबकुछ अपूर्ण हुआ  पर अब हमे बड़े बदलाव लाने हैं  इस संघर्ष के विरुद्ध नही बनाने बहाने हैं  हमें एक विराट-विकराल दर्शन पूरा करना है  समृद्धि, वैज्ञानिक विकास और नैतिकता के संगम को उभरना है  बनाना है इतना बड़ा मोर्चा जो कभी हारे नही  आसमान में भले रहें चांद तारे नही  जब तक हम सर्वस्व को सर्वस्व न बना देंगे जब तक हर मनुष्य को ईश्वर न बना देंगे तब तक यह अध्याय रहता अधूरा है इसके होने से ही अस्तित्व का मकसद होता पू...